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आपातकाल की 51वीं बरसी: रोंगटे खड़े कर देती हैं तानाशाही की यादें – लोकतंत्र सेनानी इस्लाम अहमद फारूकी।

आपातकाल की 51वीं बरसी: रोंगटे खड़े कर देती हैं तानाशाही की यादें – लोकतंत्र सेनानी इस्लाम अहमद फारूकी।

संवाददाता, वसीम कुरैशी 

कासगंज। आपातकाल, जिसे भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय माना जाता है, के 51 वर्ष पूरे हो गए हैं। 25-26 जून 1975 की मध्यरात्रि को लागू किए गए आपातकाल की विभीषिका को याद करते हुए लोकतंत्र सेनानी और ‘लोकतंत्र सेनानी कल्याण परिषद’ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष डॉ. इस्लाम अहमद फारूकी ने उन संघर्षों को साझा किया, जिन्होंने देश में लोकतंत्र को पुनर्जीवित किया।

लोकतंत्र की हत्या और संघर्ष की दास्तान

डॉ. फारूकी ने बताया कि लोकनायक जयप्रकाश नारायण द्वारा ‘सिंहासन खाली करो कि जनता आती है’ के आह्वान से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सत्ता हिल गई थी। इसके बाद 25-26 जून 1975 की रात को जबरन आपातकाल थोप दिया गया। पूरा देश एक बड़े जेलखाने में तब्दील हो गया और पुलिसिया तानाशाही चरम पर थी।

सहावर से एटा जेल तक का सफर

अपने व्यक्तिगत अनुभव साझा करते हुए डॉ. फारूकी ने कहा, “07 जुलाई 1975 को सहावर थाना पुलिस ने मुझे गिरफ्तार कर एटा जेल भेज दिया। मुझ पर आरोप था कि मैंने एक जनसभा में तानाशाही सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया था। 30 मई 1976 को एटा की अदालत ने मुझे छह माह के सश्रम कारावास की सजा सुनाई।”

लोकतंत्र सेनानियों का सम्मान और राजनीतिक उतार-चढ़ाव

आपातकाल बंदियों के महासंग्राम के बाद 1977 में लोकतंत्र की बहाली हुई और देश में पहली बार कांग्रेस सत्ता से बाहर हुई। उत्तर प्रदेश में इन सेनानियों के सम्मान की यात्रा भी उतार-चढ़ाव भरी रही। डॉ. फारूकी ने बताया कि 2006 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने पार्टी भेद भुलाकर सेनानियों को सम्मान और भत्ता देना शुरू किया। 2007 में मायावती सरकार ने इन सुविधाओं को बंद कर दिया था, लेकिन 2012 में अखिलेश यादव के मुख्यमंत्री बनने के बाद इसे वैधानिक रूप दिया गया। वर्तमान में लोकतंत्र सेनानियों को राज्य सरकार की ओर से 20,000 रुपये मासिक मानदेय दिया जा रहा है।

समय की मांग: केंद्र से भी सम्मान की अपेक्षा

डॉ. फारूकी ने चिंता व्यक्त की कि वर्तमान में कासगंज जनपद में केवल 13 लोकतंत्र सेनानी जीवित बचे हैं, जबकि 4 अन्य के आश्रितों को मानदेय मिल रहा है। उन्होंने कहा कि केवल राज्य सरकार ही नहीं, बल्कि केंद्र सरकार को भी इन सेनानियों का सम्मान करना चाहिए। उन्होंने कहा, “सेनानियों को सम्मानित करना स्वयं लोकतंत्र को सम्मानित करना है। इससे देश में लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होंगी और भविष्य में कोई भी शासक तानाशाही लाने का दुस्साहस नहीं कर पाएगा।”

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