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बहेड़ी: नन्हे कदम, बड़ी नीयत: सात साल की आयत फातिमा का पहला रोज़ा बना मिसाल।

नन्हे कदम, बड़ी नीयत: सात साल की आयत फातिमा का पहला रोज़ा बना मिसाल।

मोहम्मद वसीम, संवाददाता 

बहेड़ी (बरेली)। रहमतों और मग़फिरत के महीने माहे रमज़ान की आमद के साथ ही शहर की फिज़ा में इबादत की खुशबू घुल गई है। मस्जिदों से उठती तरावीह की आवाज़ें, घरों में सजते इफ्तार और बच्चों की मासूम दुआओं के बीच इस बार एक नन्ही बच्ची का जज़्बा लोगों के लिए प्रेरणा बन गया।

मोहल्ला मदार नगर निवासी वरिष्ठ पत्रकार मुमताज़ अली की सात वर्षीय बेटी आयत फातिमा ने इस वर्ष अपना पहला रोज़ा रखा। कम उम्र के बावजूद उसकी नीयत और हौसले ने परिवार व मोहल्ले के लोगों को प्रभावित किया। चांद नजर आते ही आयत ने स्वयं रोज़ा रखने की इच्छा जताई। परिवार ने उसे समझाया कि इस्लामी शरीअत के अनुसार नाबालिग बच्चों पर रोज़ा फर्ज नहीं होता, लेकिन उसके उत्साह को देखते हुए उसे प्रोत्साहित किया गया।

सुबह सहरी में परिवार के साथ उठना, दिनभर सब्र के साथ रोज़ा निभाना और समय पर नमाज़ अदा करना—आयत ने हर जिम्मेदारी को गंभीरता से निभाया। भूख और प्यास के बावजूद उसके चेहरे पर शिकन नहीं दिखी। इफ्तार के समय जब उसने दुआ के लिए हाथ उठाए तो घर का माहौल भावुक हो उठा।

परिजनों का कहना है कि बच्चों में धार्मिक मूल्यों और संस्कारों की नींव बचपन से ही रखी जाती है। रोज़ा भले ही फर्ज न हो, लेकिन इस प्रकार की पहल से उनमें सब्र, अनुशासन और इबादत की भावना विकसित होती है। मोहल्ले के लोगों ने भी आयत को दुआओं और मुबारकबाद से नवाज़ा।

माहे रमज़ान के पहले दिन बहेड़ी की मस्जिदों और घरों में इबादत का सिलसिला तेज़ हो गया है। नमाज़, तिलावत और खैरात के जरिए लोग इस पवित्र महीने की बरकतें हासिल करने में जुटे हैं। आयत फातिमा जैसी मासूम बच्ची का जज़्बा यह संदेश देता है कि रमज़ान केवल इबादत का ही नहीं, बल्कि संस्कार, सब्र और आत्मअनुशासन की सीख देने का महीना भी है।

 

 

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