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“मुझे हाय उनसे मुहब्बत हुई है” — लखीमपुर खीरी में बज़्म फ़रोगे अदब का 16वां तरही मुशायरा सम्पन्न, शेरों ने बाँधा समां।

“मुझे हाय उनसे मुहब्बत हुई है” — लखीमपुर खीरी में बज़्म फ़रोगे अदब का 16वां तरही मुशायरा सम्पन्न, शेरों ने बाँधा समां।

मोहम्मद असलम, संवाददाता 

लखीमपुर खीरी। अदब की खुशबू से महकती एक खुशनुमा शाम, जब शेरो-शायरी की रौनक ने दिलों को छू लिया।
बज़्म फ़रोगे अदब की ओर से आयोजित 16वां तरही मुशायरा मदरसा सुल्ताने हिंद (मोहल्ला शेखसराय, खीरी कस्बा) में शानदार अंदाज़ में संपन्न हुआ।

कार्यक्रम की सदारत बज़्म के सदर आमिर रज़ा पम्मी ने की, जबकि मेहमाने खुसूसी के रूप में डॉ. रफी अहमद मौजूद रहे।
निज़ामत का फर्ज़ इलियास चिश्ती ने अदा किया।

मुशायरे का आगाज़ सैफुल इस्लाम की कुरआन पाक की तिलावत से हुआ, जबकि डॉ. एहराज अरमान ने नातिया कलाम से माहौल को रूहानी बना दिया —

“कलंडर में देखा है आका का रोज़ा, अभी इस तरह से ज़ियारत हुई है।”

इसके बाद एक से बढ़कर एक शायरों ने अपने कलाम से मुशायरे में जान डाल दी।

बज़्म के सदर आमिर रज़ा पम्मी ने पढ़ा —

“मिरी जब से घर उनके दावत हुई है,
रक़ीबो से मेरी अदावत हुई है।”

मेहमाने खुसूसी डॉ. रफ़ी अहमद ने कहा —

“यहां ज़ालिमों की हिमायत हुई है,
मुझे इस अदालत से नफरत हुई है।”

इलियास चिश्ती ने अपने अंदाज़ में पेश किया —

“कोई आदमी भेड़िया बन गया था,
तभी ख़ूं में चिड़िया ये लतपत हुई है।”

इक़बाल अकरम वारसी ने समां बाँधते हुए कहा —

“ज़लीलों को मंसब बड़े मिल गए हैं,
ज़मीरो की जब से तिजारत हुई है।”

नफीस वारसी ने दिल छू लेने वाले अल्फ़ाज़ों में कहा —

“शिकन उनके माथे की कहती है मुझसे,
मुझे देख कर उनको दिक्कत हुई है।”

हरगांव से आए शायर रिजवान मारूफ वारसी की पंक्तियों ने महफ़िल को झूमने पर मजबूर कर दिया —

“कोई उनसे कह दे, न वो दूर जाएं,
मुझे हाय उनसे मुहब्बत हुई है।”

इसी तरही मिसरे पर कई शायरों ने अपने-अपने कलाम पेश किए, जिनमें सैयद सलमान अहमद रिजवी, डॉ. एहराज अरमान, अय्यूब अंसारी, सैफुल्ल इस्लाम, हसन अंसारी और जावेद अंसारी शामिल रहे।

जो शायर नशिस्त में शामिल नहीं हो सके, उन्होंने अपने कलाम लिखित रूप में भेजे —
बशर हरगामी ने लिखा —

“इशारों पे मेरे जो कल नाचते थे,
उन्हें आज आने में ज़हमत हुई है।”

वसीक रज़ा का शेर महक उठा —

“तमन्ना है मैं उसकी आँखों को चूमूँ,
मदीने की जिसको ज़ियारत हुई है।”

इमरान रज़ा बरकाती ने मां की दुआओं को यूं बयां किया —

“मैं इस हादसे से अभी जो बचा हूं,
ये मां की दुआ से हिफाज़त हुई है।”

मुशायरा देर रात तक शेरो-शायरी की लय में गूंजता रहा और श्रोताओं ने हर शेर पर दिल खोलकर दाद दी।
कार्यक्रम का समापन दुआओं और तालियों की गूंज के साथ हुआ।

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