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रमजान के आखिरी अशरे की बढ़ी अहमियत, इबादत और दुआओं में जुटे रोजेदार।

रमजान के आखिरी अशरे की बढ़ी अहमियत, इबादत और दुआओं में जुटे रोजेदार।

आई एम खान 

बिसौली। बरकतों और रहमतों से भरे पवित्र महीने रमजान का आखिरी यानी तीसरा अशरा शुरू हो चुका है। यह अशरा ईद का चांद दिखाई देने तक चलता है और इसे मगफिरत तथा जहन्नुम की आग से निजात पाने का दौर माना जाता है। इस दौरान रोजेदार ज्यादा से ज्यादा इबादत कर अल्लाह से अपने गुनाहों की माफी और रहमत की दुआ मांगते हैं।

रज़ा मस्जिद के इमाम हाफिज शरीफ रजा जामी ने अपने बयान में बताया कि रमजान का हर लम्हा रहमत और बरकत से भरा होता है, लेकिन तीसरे अशरे की खास अहमियत होती है। इस दौरान कई लोग ऐतकाफ में बैठकर पूरी तरह इबादत में मशगूल हो जाते हैं और अल्लाह की रज़ा हासिल करने की कोशिश करते हैं।

उन्होंने बताया कि इसी आखिरी अशरे में लैलातुल कद्र की मुबारक रातें आती हैं, जिन्हें शबे कद्र कहा जाता है। इन रातों में इबादत का सवाब हजार महीनों की इबादत से भी ज्यादा बताया गया है। आम तौर पर 27वीं रात को सबसे ज्यादा फजीलत वाली शबे कद्र माना जाता है, इसलिए मुसलमान इन रातों में खास तौर पर नमाज, कुरआन की तिलावत और दुआओं में वक्त बिताते हैं।

इमाम शरीफ रजा जामी ने कहा कि रमजान के इस मुबारक महीने में नेकी के काम बढ़ा देने चाहिए। जरूरतमंदों की मदद करना, सदका, जकात और फितरा अदा करना, गरीबों और बेसहारा लोगों का ख्याल रखना इस महीने की अहम जिम्मेदारी है। उन्होंने लोगों से अपील की कि ज्यादा से ज्यादा इबादत और नेक काम कर अल्लाह की रहमत हासिल करें और समाज में अमन, भाईचारा और इंसानियत का संदेश फैलाएं।

 

 

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