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ताले में कैद अन्नदाता की उम्मीदें, सिस्टम की बेरुखी से सिसक रहा उसावां।

ताले में कैद अन्नदाता की उम्मीदें, सिस्टम की बेरुखी से सिसक रहा उसावां।

संवाददाता, शैलेन्द्र सिंह 

बदायूं/उसावां। जनपद के उसावां क्षेत्र में सरकारी व्यवस्थाओं की लापरवाही और प्रशासनिक उदासीनता के कारण अन्नदाता आज गहरे संकट में है। कभी किसानों के लिए राहत का बड़ा केंद्र माना जाने वाला उसावां बस स्टैंड स्थित इफको ई-बाजार केंद्र आज वीरानी का शिकार हो चुका है। केंद्र के बंद शटर पर लटका ताला न केवल एक संस्थान के बंद होने की निशानी है, बल्कि यह उन हजारों किसानों के भरोसे के टूटने का भी प्रतीक है जो अपनी फसलों और खेती के लिए पूरी तरह इसी केंद्र पर निर्भर थे।

खरीफ सीजन की शुरुआत के साथ ही खेतों की तैयारी पूरी हो चुकी है और किसान आसमान की ओर उम्मीद लगाए बैठा है, लेकिन खाद की अनुपलब्धता ने खेती की गाड़ी को पटरी से उतार दिया है। क्षेत्र के किसानों का दर्द है कि पहले गांव के नजदीक ही डीएपी, यूरिया और अन्य कृषि सामग्री सुलभ हो जाती थी, लेकिन अब विभाग द्वारा इस केंद्र को बिल्सी से संबद्ध कर देने के कारण स्थितियां बदतर हो गई हैं। किसानों को खाद के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ रही है, जहां घंटों कतारों में खड़े होने के बाद भी खाद मिलने की कोई ठोस गारंटी नहीं होती।

गांव-गांव में खाद की इस किल्लत ने किसानों को आर्थिक आपदा की ओर धकेल दिया है। महंगे डीजल, बिजली संकट और मौसम की मार झेल रहे किसान अब खाद की तलाश में एक से दूसरे केंद्र तक भटकने को मजबूर हैं, जिससे उनकी लागत और मानसिक परेशानी दोनों बढ़ रही है। ग्रामीणों को डर है कि यदि समय रहते खाद की आपूर्ति सुनिश्चित नहीं की गई, तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन पर पड़ेगा और खेतों में हरियाली की जगह नुकसान दिखाई देगा। इस गंभीर समस्या पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम कर रही है।

हालांकि इस संबंध में इफको क्षेत्र अधिकारी का कहना है कि उसावां केंद्र पर बिक्री कम होने के कारण इसे बिल्सी केंद्र से जोड़ा गया है, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। किसानों का सवाल है कि जिस व्यवस्था में उन्हें दर-दर भटकना पड़े और उनका समय व पैसा बर्बाद हो, वह व्यवस्था आखिर किसके हित में है। आज उसावां का हर किसान सिर्फ यही पूछ रहा है कि अगर खाद के लिए ही उसे इतनी जद्दोजहद करनी पड़ेगी, तो खेतों में हरियाली कैसे आएगी और देश की रीढ़ कहे जाने वाले किसान का भविष्य कैसे सुरक्षित होगा।

 

 

 

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