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बलरामपुर में दिव्यांग महिला की पीड़ा: विकास भवन के चक्कर में फंसा परिवार, मदद की आस अभी भी अधूरी। 

बलरामपुर में दिव्यांग महिला की पीड़ा: विकास भवन के चक्कर में फंसा परिवार, मदद की आस अभी भी अधूरी। 

गुलाम नबी कुरैशी, संवाददाता

बलरामपुर। बलरामपुर जिले के विकास भवन में महीनों से एक परिवार एक ट्राईसाइकिल की उम्मीद में भटक रहा है। यह ट्राईसाइकिल उनके लिए सिर्फ़ साधन नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन जीने की आस है। भाई अपनी दिव्यांग बहन को साइकिल पर ले जाता है और जहाँ साइकिल नहीं जा सकती वहाँ अपनी पीठ पर बैठाकर ले जाता है। पिता अपनी बेटी को लेकर विकास भवन में निरंतर अधिकारियों से मदद मांगता है। महीनों बीत चुके हैं, लेकिन ट्राईसाइकिल अब तक नहीं मिली।

मीडिया टीम जब मौके पर पहुंची, तो भाई, पिता और बहन तीनों आँखों में आँसू लिए अपनी पीड़ा साझा कर रहे थे। उन्होंने बताया कि उनके पास ना पर्याप्त भोजन है, ना पैसे, और उनका एक छोटा झोपड़ी जैसा आश्रय ही है। देवीपाटन मंदिर तुलसीपुर से 30 किलोमीटर दूर से आए इस परिवार की एक ही मांग है—ट्राईसाइकिल, ताकि दिव्यांग बहन अपने पैरों पर खड़ी होकर जीवन जी सके।

विकास भवन में अधिकारियों और कर्मचारियों की लापरवाही ने इस परिवार की उम्मीदों पर गहरा झटका दिया है। कुछ महीने पहले उपलब्ध कराई गई नई दिव्यांग साइकिलें कहीं गायब हो गईं, कहीं हैंडल और पहिया नदारद था, और कहीं पूरी साइकिल पानी में लिपटी मिली। जब मीडिया ने इस मामले में अधिकारियों से सवाल किया, तो जवाब मिला कि एफिडेविट लिख कर दें। जबकि सवाल यह है कि ट्राईसाइकिल किसके हाथों से कबाड़ में चली गई और ज़मीनी मदद क्यों नहीं मिल रही, इसका जवाब प्रशासन ही दे सकता है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अक्सर दिव्यांगजनों के लिए सहायता और ट्राईसाइकिल उपलब्ध कराने की बात करते हैं, लेकिन बलरामपुर में ज़मीनी हकीकत कुछ और ही कहती है। इस कहानी में परिवार की पीड़ा और प्रशासन की नाकामी साफ झलकती है। अब देखना यह है कि क्या प्रशासन समय रहते इस परिवार तक आवश्यक मदद पहुँचाएगा, या यह परिवार निराश होकर एक बार फिर लौट जाएगा, जैसे पिछले छह महीनों से लौटता आया है।

इस मामले से यह स्पष्ट होता है कि सिर्फ नीतियाँ और योजनाएँ काफी नहीं हैं, उनका सही क्रियान्वयन और ज़मीनी स्तर पर निगरानी भी उतनी ही जरूरी है।

Byte – पीड़ित

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