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सहसवान: गहलोल गौशाला का असली सच: अव्यवस्थाओं की कब्रगाह में तब्दील, दो गौवंशों की मौत—कई की हालत नाजुक।

गहलोल गौशाला का असली सच: अव्यवस्थाओं की कब्रगाह में तब्दील, दो गौवंशों की मौत—कई की हालत नाजुक।

मोहित यादव, संवाददाता 

सहसवान (बदायूं)। ग्राम पंचायत होतीपुर के मजरा गहलोल की गौशाला इन दिनों मौत का गढ़ बन चुकी है। जिस जगह को संरक्षण और सेवा का केंद्र होना चाहिए था, वह अब व्यवस्थाओं की असफलता का भयानक उदाहरण बनकर खड़ी है। बीती रात ठंड, भूख और गंदगी के बीच दो गौवंशों की जान चली गई, जबकि कई और पशु टूट कर मौत के इंतजार में पड़े हैं। ग्रामीणों का कहना है—“यह गौशाला नहीं, पशुओं का नरक है, जहाँ हर दिन मौतें दबाकर दफनाई जाती हैं।”

गौशाला की जिम्मेदारी बदायूं की एक एनजीओ को सौंप दी गई है, लेकिन संस्था ने देखभाल से ज्यादा पर्दा डालने का काम किया है। पुराने केयरटेकर हटाकर दो नए कर्मचारियों को भेज तो दिया गया, पर उनके पास न सफाई का सामान है, न पानी देने की व्यवस्था, न ही बीमार पशुओं के इलाज के साधन। दोनों केयरटेकर खुले शब्दों में कहते हैं—“हमें सिर्फ नाम के लिए भेजा गया है। न एक फावड़ा मिला, न झाड़ू, न परात, न ठेला। हाथ खाली हैं, और पशु भूखे-प्यासे पड़े हैं।”

गौशाला में चार दर्जन से अधिक गौवंश मौजूद हैं जिनमें से लगभग आधे बिना टैग के हैं। ग्रामीण बताते हैं कि यहाँ मरने वाले पशुओं की गिनती छिपाने के लिए रोज नए घुमंतू पशु अंदर छोड़ दिए जाते हैं। महीनों से सफाई न होने की वजह से पूरे परिसर में घुटनों तक कीचड़, गोबर और सड़ांध भरी गंदगी पसरी हुई है। इसी गंदगी और ठंड में मवेशी तड़प-तड़पकर अपनी आखिरी सांसें लेते हैं।

ठंड से बचाने के नाम पर गौशाला में हल्की-सी बरसाती टांगी गई है, जो हवा में उड़ती रहती है। बीच का हिस्सा खुला छोड़ देने से ठंडी हवा सीधे पशुओं पर पड़ती है। यह व्यवस्था नहीं, बल्कि बेफिक्री का जीवंत नमूना है। समरसेबल वर्षों से खराब पड़ा है, इसलिए पानी का इंतजाम भी पड़ोस की टंकी से खींचकर किसी तरह किया जा रहा है।

सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि ग्रामीणों के अनुसार पिछले तीन वर्षों में करीब तीन सौ से अधिक गौवंशों की मौत हो चुकी है। दफनाने की जगह खत्म पड़ गई है। कई जगह मृत पशुओं की हड्डियाँ और अवशेष जमीन से झांकते दिखाई देते हैं। आवारा कुत्ते इन अवशेषों को बाहर खींचकर ले जाते हैं, जिससे पूरा परिसर नरक जैसा दृश्य पेश करता है। ग्रामीण कहते हैं—“यह गौशाला नहीं, कब्रिस्तान है। शासन-प्रशासन की अनदेखी की जीवित मिसाल।”

इसी बीच नोडल अधिकारी की रिपोर्ट में गौशाला की व्यवस्था को “संतोषजनक” बताया गया है। लेकिन घटनास्थल की तस्वीरें और ग्रामीणों की आपबीती उस रिपोर्ट की सच्चाई पर बड़ा सवाल खड़ा कर देती हैं। ग्राम विकास अधिकारी ने माना कि जिम्मेदारी संस्था को दी गई है, जबकि खंड विकास अधिकारी से संपर्क नहीं हो सका।

गहलोल की यह गौशाला अब प्रशासन की लापरवाही, एनजीओ की उदासीनता और सिस्टम की विफलता का काला आईना बनकर उभर रही है। ग्रामीणों की मांग है कि जिला प्रशासन तुरंत पहुंचकर जमीनी तमाशा खुद देखे—क्योंकि हर बीतता दिन यहाँ एक और मासूम गौवंश की जान ले रहा है।

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