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उत्साह और पारंपरिक आस्था के साथ मनाया गया गोवर्धन पूजा और भैया दूज का पर्व, गूंजे मंगलगीत और झलकी लोक संस्कृति।

उत्साह और पारंपरिक आस्था के साथ मनाया गया गोवर्धन पूजा और भैया दूज का पर्व, गूंजे मंगलगीत और झलकी लोक संस्कृति।

जयशंकर मिश्रा, संवाददाता 

चंदौली। जनपद के बलुआ बाजार और आसपास के ग्रामीण इलाकों में बुधवार को गोवर्धन पूजा और भैया दूज का पर्व पारंपरिक उत्साह और धार्मिक आस्था के साथ मनाया गया। सुबह से ही गांव-गांव और मुहल्लों में पूजा-अर्चना और भक्ति गीतों की गूंज सुनाई दी।

महिलाओं और युवतियों ने गाय के गोबर से भगवान गोवर्धन की आकृतियाँ बनाकर उनका पूजन किया, फूल-मालाओं और रंगोलियों से उन्हें सजाया। कई स्थानों पर महिलाओं ने पारंपरिक गीत गाते हुए “गोवर्धन धरम रखै राजा, सब पर कृपा कीन्हें राजा” जैसे भजन प्रस्तुत किए, जिससे वातावरण भक्ति और उल्लास से भर उठा।

बलुआ बाजार में पकड़ी के पेड़ के पास आयोजित मुख्य समारोह में महिलाओं ने पारंपरिक वेशभूषा धारण कर पूजा की रस्में निभाईं। इसके साथ ही विभिन्न स्थानों पर चित्रगुप्त जयंती भी श्रद्धा और सम्मान के साथ मनाई गई।

ग्राम सभा सराय महुअर डेरवा बलुआ समेत कई गांवों में महिलाओं ने गोबर से भगवान गोवर्धन की आकृतियाँ बनाकर पारंपरिक कथा सुनी और मंगलगीत गाए। ग्रामीण अंचलों में महिलाएं और बच्चे भटकटइया और गूंग घास खोजने निकले, जो भैया दूज पर्व की पारंपरिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है।

भैया दूज के अवसर पर बहनों ने भाइयों के माथे पर तिलक कर उनकी दीर्घायु की कामना की, जबकि भाइयों ने उपहार देकर स्नेह और आभार व्यक्त किया। मान्यता है कि इसी दिन यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने आए थे, और उनके सत्कार से प्रसन्न होकर उन्होंने आशीर्वाद दिया था कि जो भाई इस दिन तिलक करवाएगा, उसे यमलोक का भय नहीं रहेगा।

ब्रती महिलाओं ने बताया कि यह पर्व भाई की मंगलकामना के लिए समर्पित है। पूजा के बाद महिलाओं ने भटकटइया घास के कांटों से प्रतीकात्मक रूप से जिह्वा चुभाकर संकल्प लिया कि भाई को कोई संकट न आए।

दिनभर क्षेत्र के कस्बों और गांवों में लोकगीत, पारंपरिक कथा और रीति-रिवाजों के बीच भाई-बहन के स्नेह और लोक संस्कृति का यह पर्व उल्लास, श्रद्धा और शांति के वातावरण में संपन्न हुआ।

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