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जैविक खेती से बदली किसानों की तकदीर, कम लागत में बढ़ा मुनाफा और महिलाओं ने भी संभाली कमान।

जैविक खेती से बदली किसानों की तकदीर, कम लागत में बढ़ा मुनाफा और महिलाओं ने भी संभाली कमान।

संवाददाता, शैलेन्द्र सिंह

बदायूं। जनपद में नमामि गंगे जैविक खेती परियोजना के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं, जहाँ रासायनिक खेती की बढ़ती लागत और घटती उर्वरक शक्ति के बीच किसान अब जैविक पद्धति को अपनाकर अपनी आय बढ़ा रहे हैं। परियोजना से जुड़े ग्राम सिकन्दराबाद निवासी कृषक वीर प्रताप सिंह ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी 0.4 हेक्टेयर भूमि पर रबी सीजन में गेहूं की फसल से जैविक खेती की सफल शुरुआत की।

उन्होंने फसल बुवाई से पूर्व भूमि का शोधन किया और घर के ही बीज को बीजामृत से उपचारित किया। रासायनिक खाद के स्थान पर उन्होंने प्रोम खाद और वर्मी कम्पोस्ट का उपयोग किया, जिससे मिट्टी को प्राकृतिक रूप से पोषक तत्व मिले। सिंचाई के दौरान जीवामृत और कीट नियंत्रण के लिए हर्बल कीटनाशकों के प्रयोग से फसल पूरी तरह सुरक्षित रही। वीर प्रताप के अनुसार, हालांकि उत्पादन में मामूली कमी आई, लेकिन लागत में 30 से 40 प्रतिशत की बड़ी गिरावट होने से उनके शुद्ध मुनाफे में वृद्धि हुई है।

इस परियोजना के अंतर्गत कृषि विविधीकरण परियोजना (यूपीडास्प) के माध्यम से किसानों को आर्थिक संबल भी प्रदान किया जा रहा है। समूह के सदस्यों को प्रथम वर्ष 12 हजार, द्वितीय वर्ष 10 हजार और तृतीय वर्ष 9 हजार रुपये प्रति हेक्टेयर की दर से अनुदान सीधे डीबीटी के माध्यम से उनके खातों में भेजा जा रहा है। किसानों को नियमित रूप से तरल जैव खाद, वर्मी कम्पोस्ट और विभिन्न जैविक उर्वरक तैयार करने का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। पोषक तत्व प्रबंधन के साथ-साथ ट्राइकोग्रामा कार्ड, गौमूत्र और नीम तेल जैसे जैविक विकल्पों को बढ़ावा दिया जा रहा है ताकि फसल उत्पादन को सुरक्षित और संतुलित रखा जा सके। पीजीएस मानकों के अनुसार जैविक प्रमाणन प्रक्रिया का भी कड़ाई से पालन कराया जा रहा है, जिससे भविष्य में उत्पादों को बेहतर बाजार मिल सके।

जैविक खेती के इस अभियान ने ग्रामीण क्षेत्र में महिला सशक्तिकरण को भी नई दिशा दी है। परियोजना के अंतर्गत महिला कृषकों की भागीदारी तेजी से बढ़ी है और वे समूह की गतिविधियों में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं। अतिरिक्त आय होने से उनके रहन-सहन के स्तर में सुधार हुआ है, जिसे देखकर गांव की अन्य महिलाएं भी अब जैविक खेती की ओर आकर्षित हो रही हैं। महिलाओं का यह जुड़ाव न केवल पर्यावरण के अनुकूल खेती को बढ़ावा दे रहा है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी आत्मनिर्भर बना रहा है। परियोजना की सफलता और किसानों के उत्साह को देखते हुए उम्मीद है कि आने वाले समय में जैविक उत्पादों की गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता में और अधिक सुधार देखने को मिलेगा।

 

 

 

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