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बिसौली: हाईटेक दौर में भी कायम है परंपरा, भूरे फारूकी रोजेदारों को घर-घर जाकर जगाकर कराते हैं सेहरी।

हाईटेक दौर में भी कायम है परंपरा, भूरे फारूकी रोजेदारों को घर-घर जाकर जगाकर कराते हैं सेहरी।

आई एम खान 

बिसौली। आधुनिक और हाईटेक दौर में जहां लोग अलार्म और मोबाइल पर निर्भर हैं, वहीं नगर में आज भी पुरानी परंपराओं को जीवित रखने वाले लोग समाज के लिए मिसाल बने हुए हैं। बिसौली निवासी भूरे फारूकी पिछले कई वर्षों से रोजेदारों को समय पर सेहरी के लिए घर-घर जाकर जगाने का काम कर रहे हैं।

जानकारी के अनुसार, भूरे फारूकी रात करीब 2 बजे से अपने कार्य की शुरुआत करते हैं और सुबह लगभग 5 बजे तक नगर के विभिन्न इलाकों में घूम-घूमकर लोगों को सेहरी के लिए जगाते हैं। वे जोर-जोर से आवाज लगाकर रोजेदारों को नींद से उठाते हैं, ताकि सभी लोग समय पर सेहरी कर सकें।

भूरे फारूकी ने बताया कि भले ही आज तकनीक का जमाना है, लेकिन वे आज भी पुरानी परंपराओं का पालन कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि पहले के समय में अलार्म या घड़ियों का चलन नहीं था, तब लोग एक-दूसरे को जगाकर रोजा रखने में सहयोग करते थे। उसी परंपरा को वह पिछले करीब दस वर्षों से निभा रहे हैं।

उन्होंने बताया कि उनका उद्देश्य यही है कि कोई भी रोजेदार सेहरी से वंचित न रहे और सभी लोग समय पर उठकर अपना रोजा रख सकें। सेहरी के बाद वे स्वयं अपने घर जाकर भोजन करते हैं।

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब मोबाइल अलार्म बजकर बंद हो जाता है, तब भी कई बार नींद नहीं खुलती, लेकिन भूरे फारूकी की आवाज “रोजेदारों सेहरी कर लो” सुनकर तुरंत नींद खुल जाती है। लोगों ने उनके इस प्रयास की सराहना करते हुए इसे समाज के लिए प्रेरणादायक बताया है।

नगर में भूरे फारूकी का यह कार्य आपसी सहयोग और परंपरा को जीवित रखने की एक अनूठी मिसाल बन चुका है।

 

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