Breaking News

बदायूं: अनहोनी के बाद ही क्यों जागता है बदायूं का स्वास्थ्य महकमा ? कागजों में सिमटा अवैध अस्पतालों और झोलाछापों के खिलाफ अभियान। 

सांकेतिक चित्र

इस्लामनगर से पहले सहसवान में भी गूंजी थीं जच्चा-बच्चा की मौत की चीखें, सिर्फ सीलिंग की कार्रवाई कर पल्ला झाड़ रहा प्रशासन।

विशेष रिपोर्ट 

बदायूं। जनपद बदायूं में स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली पर एक बार फिर गंभीर सवालिया निशान खड़े हो गए हैं। शुक्रवार, 29 मई 2026 को इस्लामनगर में एक अवैध अस्पताल के भीतर लापरवाही के चलते जच्चा-बच्चा की दर्दनाक मौत के बाद प्रशासन ने आनन-फानन में अस्पताल को सील तो कर दिया, लेकिन इस पूरी कार्रवाई ने विभाग की घोर उदासीनता की पोल खोलकर रख दी है। सवाल यह उठता है कि आखिर प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग तभी क्यों गंभीर होते हैं, जब किसी गरीब के घर का चिराग बुझ जाता है या कोई बड़ी अनहोनी हो जाती है? किसी मासूम की जान जाने के बाद ही अधिकारियों की छापामार कार्रवाई क्यों शुरू होती है? आखिर कब तक बदायूं की जनता इस बदहाली का शिकार होती रहेगी और कब तक ऐसा चलता रहेगा?

यह गंभीर स्थिति केवल किसी एक कस्बे या इस्लामनगर तक सीमित नहीं है। कुछ समय पूर्व सहसवान तहसील क्षेत्र में भी ठीक ऐसा ही मामला सामने आया था, जहां प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मौत हो गई थी और तब भी प्रशासन ने यही रटा-रटाया तरीका अपनाते हुए अस्पताल को सील कर दिया था। यदि धरातल पर निष्पक्ष समीक्षा की जाए, तो बदायूं जनपद की समस्त तहसीलों में और ग्रामीण क्षेत्रों में अगर अस्पताल और नर्सिंग होम चल रहे हैं, तो उनमें से अधिकांश बिना किसी कानूनी वैधता के संचालित हो रहे हैं। जिले के चप्पे-चप्पे और सुदूर देहातों में इस तरह के सैकड़ों अवैध नर्सिंग होम, निजी अस्पताल और फर्जी पैथोलॉजी लैब धड़ल्ले से पैर पसारे हुए हैं। इन सेंटरों पर न तो कोई योग्य या डिग्रीधारी चिकित्सक मौजूद है और ना ही ये संस्थान स्वास्थ्य विभाग के मानकों को पूरा करते हैं। इसके बावजूद, विभागीय सांठगांठ और संरक्षण के चलते इन झोलाछाप डॉक्टरों की दुकानें बेखौफ होकर चल रही हैं और यह सीधे तौर पर आम जनमानस की जिंदगियों के साथ खिलवाड़ है।

कागजों में सिमटी गाइडलाइंस, धरातल पर न डॉक्टर न सुविधाएं।

सबसे बड़ा और यक्ष प्रश्न यह है कि जो अस्पताल और नर्सिंग होम धड़ल्ले से चल रहे हैं, क्या वे चिकित्सा विभाग के कड़े मानकों को पूरा कर रहे हैं? नियम और सरकारी गाइडलाइंस के मुताबिक, किसी भी नर्सिंग होम या निजी अस्पताल को चलाने के लिए फायर एनओसी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का प्रमाण पत्र, बायो-मेडिकल वेस्ट निस्तारण की व्यवस्था और पर्याप्त जगह का होना अनिवार्य है। इसके साथ ही, गंभीर मरीजों के लिए आपातकालीन आईसीयू (ICU) बैकअप, लाइफ सपोर्ट सिस्टम, वेंटिलेटर, और चौबीस घंटे प्रशिक्षित पैरामेडिकल स्टाफ की मौजूदगी अनिवार्य शर्त है।

लेकिन बदायूं के इन अवैध सेंटरों पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट है। मानकों और गाइडलाइंस की धज्जियां उड़ाते हुए ये अस्पताल महज दो-तीन कमरों के मकानों या दुकानों में बेसमेंट के अंदर संचालित हो रहे हैं। इमरजेंसी के नाम पर यहाँ न तो ऑक्सीजन की सही व्यवस्था है और न ही जीवन रक्षक दवाइयां। सबसे हैरान करने वाली बात तो डॉक्टरों की अनुपलब्धता है। नियमानुसार अस्पताल में पूर्णकालिक (फुल-टाइम) डिग्रीधारी और पंजीकृत डॉक्टर (MBBS/MD) का होना अनिवार्य है, लेकिन इन फर्जी नर्सिंग होमों में डॉक्टर केवल बोर्ड पर चमकते नामों तक सीमित हैं। धरातल पर मरीजों का इलाज, यहाँ तक कि प्रसव (डिलीवरी) और गंभीर ऑपरेशन भी बाहर से डॉक्टर बुलाकर कराए जाते हैं। ऑपरेशन करने के बाद वह डॉक्टर तो चले जाते हैं मगर उस मरीज को बिना योग्यता वाले झोलाछाप या अप्रशिक्षित कंपाउंडर और दाई के भरोसे छोड़ जाते हैं।

जनता में आक्रोश: आखिर पहले क्यों नहीं होती चेकिंग?

जनता के बीच इस बात को लेकर भारी आक्रोश है कि अगर स्वास्थ्य विभाग जागरूक रहते हुए नियमित रूप से अभियान चलाए, तो ऐसी घटनाओं को रोका जा सकता है। विभाग की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह समस्त जनपद में चल रहे निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम के रजिस्ट्रेशन (पंजीकरण) की सघन जांच करे। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जो अस्पताल चल रहे हैं, वे स्वास्थ्य मानकों के अनुरूप हैं या नहीं, वहां वेंटिलेटर, आपातकालीन दवाएं और योग्य स्टाफ है या नहीं। मगर धरातल पर ऐसा कुछ भी देखने को नहीं मिलता। पूरी व्यवस्था पूरी तरह से सुस्त पड़ी रहती है और जब कोई बड़ी वारदात हो जाती है, तो अधिकारी कुछ दिनों के लिए कागजी कोरम पूरा करने निकल पड़ते हैं।

इस्लामनगर में माही हेल्थ केयर सेंटर में हुई 19 वर्षीय नरगिश और उसके नवजात शिशु की मौत इसका ताजा और जीवंत उदाहरण है। यदि स्वास्थ्य विभाग पहले से सक्रिय रहता और बिना रजिस्ट्रेशन चल रहे इस मौत के अड्डे को पहले ही बंद करा देता, तो आज एक हंसता-खेलता परिवार तबाह होने से बच जाता। आज इस दोहरी मौत के बाद स्वास्थ्य विभाग की नींद टूटी है और वे जांच की बात कर रहे हैं। क्षेत्रीय प्रबुद्ध नागरिकों और समाजसेवियों ने जिलाधिकारी और उच्चाधिकारियों से मांग की है कि इस ‘दिखावटी’ और ‘हड़कंप’ वाली कार्रवाई से हटकर, बदायूं जनपद की समस्त तहसीलों और ग्रामीण क्षेत्रों में एक स्थाई और पारदर्शी चेकिंग अभियान चलाया जाए, ताकि भविष्य में किसी अन्य बेगुनाह को अपनी जान न गंवानी पड़े।

 

 

 

 

Spread the love

Check Also

कासगंज: सोरों में जुआरियों पर पुलिस का शिकंजा, 1 लाख से अधिक की नकदी और 5 बाइक बरामद।

कासगंज: सोरों में जुआरियों पर पुलिस का शिकंजा, 1 लाख से अधिक की नकदी और …

error: Content is protected !!