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बरेली: रफी की याद में 40 साल से 31 जुलाई को रिक्शा लेकर निकलते हैं हसनैन, गीत सुनकर थम जाती हैं बहेड़ी की राहें।

रफी की याद में 40 साल से 31 जुलाई को रिक्शा लेकर निकलते हैं हसनैन, गीत सुनकर थम जाती हैं बहेड़ी की राहें।

संवाददाता, मोहम्मद वसीम 

बहेड़ी (बरेली)। किसी कलाकार के प्रति लगाव कब जुनून और फिर परंपरा बन जाए, इसका अनोखा उदाहरण बहेड़ी में देखने को मिलता है। मोहल्ला शाहजी नगर निवासी मोहम्मद हसनैन पिछले करीब 40 वर्षों से हर साल 31 जुलाई को महान गायक मोहम्मद रफी की स्मृति में अनूठे अंदाज में श्रद्धांजलि देते आ रहे हैं। रफी की पुण्यतिथि पर वह अपने रिक्शे को साउंड सिस्टम और गायक की तस्वीर से सजाकर शहर की गलियों में निकलते हैं।

शुक्रवार को मोहम्मद रफी की 46वीं पुण्यतिथि पर भी हसनैन की यह परंपरा जारी रही। रिक्शे पर रफी साहब की तस्वीर लगाकर उनके सदाबहार गीत बजाए गए। जैसे ही रिक्शा बाजार और मोहल्लों से गुजरता, गीतों की आवाज सुनकर राहगीरों के कदम कुछ पल के लिए रुक जाते। बुजुर्गों के चेहरों पर पुरानी यादों की झलक दिखाई दी तो युवाओं ने भी इस अनोखी श्रद्धांजलि को उत्सुकता से देखा।

हसनैन बताते हैं कि करीब चार दशक पहले शुरू हुई यह पहल आज उनके जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। हर वर्ष 31 जुलाई को वह अपने दूसरे कामों से अलग रहकर दिनभर रफी साहब को याद करते हैं। उनका कहना है कि उन्होंने रफी को प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं देखा, लेकिन उनकी आवाज से ऐसा जुड़ाव हुआ कि समय गुजरने के बावजूद यह लगाव कम नहीं हुआ।

रफी के लोकप्रिय गीतों की गूंज के बीच बहेड़ी की सड़कों पर शुक्रवार को भी संगीत का अलग ही माहौल रहा। गीतों ने बुजुर्गों को बीते दौर की यादों से जोड़ा तो नई पीढ़ी को भी महान गायक की आवाज से रूबरू होने का अवसर मिला।

हसनैन का मानना है कि कलाकार का जीवन भले ही समाप्त हो जाए, लेकिन उसकी कला और आवाज लोगों के बीच लंबे समय तक जीवित रहती है। इसी उद्देश्य से वह चाहते हैं कि मोहम्मद रफी के गीत नई पीढ़ी तक भी पहुंचें और लोग उनकी गायकी की विरासत को समझें।

बहेड़ी में अब 31 जुलाई हसनैन के लिए केवल पुण्यतिथि नहीं, बल्कि रफी साहब को याद करने का वार्षिक अवसर बन चुका है। चार दशक से रिक्शे पर सवार होकर शहर की गलियों में गूंजती रफी की आवाज इस बात की गवाही देती है कि सच्चे कलाकार की कला को समय की दूरी भी लोगों के दिलों से मिटा नहीं सकती।

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