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करियर की अंधी दौड़ में कहीं छूट तो नहीं रहा पारिवारिक जीवन? – कुमार सुंदरम्।

करियर की अंधी दौड़ में कहीं छूट तो नहीं रहा पारिवारिक जीवन? – कुमार सुंदरम्।

संपादकीय। वर्तमान समय प्रतिस्पर्धा, महत्वाकांक्षा और उपलब्धियों का युग है। युवा वर्ग उच्च शिक्षा, सरकारी एवं निजी नौकरियों में पदोन्नति, व्यवसाय के विस्तार तथा आर्थिक समृद्धि के लिए निरंतर प्रयासरत है। सफलता प्राप्त करना प्रत्येक व्यक्ति का अधिकार और आवश्यकता है, किंतु प्रश्न यह है कि क्या इस सफलता की दौड़ में हम जीवन की उन मूलभूत खुशियों से दूर होते जा रहे हैं, जिन पर समाज और परिवार की नींव टिकी होती है?

आज का युवा अपने भविष्य को सुरक्षित करने के लिए दिन-रात संघर्ष कर रहा है। बेहतर नौकरी, बड़ा पद, अधिक वेतन, प्रतिष्ठित व्यवसाय और सामाजिक पहचान की चाह में विवाह जैसे महत्वपूर्ण निर्णय को लगातार टालना एक सामान्य प्रवृत्ति बनती जा रही है। “अभी करियर बनाना है”, “अभी प्रमोशन लेना है”, “अभी व्यवसाय को स्थापित करना है” जैसी सोच धीरे-धीरे वर्षों में बदल जाती है और देखते ही देखते जीवन का एक महत्वपूर्ण पड़ाव पीछे छूटने लगता है।

वास्तविकता यह है कि धन, पद और प्रतिष्ठा जीवन को सुविधाजनक अवश्य बनाते हैं, लेकिन वे जीवन की पूर्णता की गारंटी नहीं दे सकते। परिवार, जीवनसाथी, माता-पिता का स्नेह, बच्चों की मुस्कान और रिश्तों की गर्माहट ऐसे अमूल्य तत्व हैं, जिन्हें किसी भी भौतिक उपलब्धि से नहीं खरीदा जा सकता। जब व्यक्ति जीवन के उत्तरार्ध में पहुँचता है, तब उसे अपने बैंक खाते से अधिक अपनेपन और भावनात्मक सहारे की आवश्यकता महसूस होती है।

चिंता का विषय यह भी है कि समाज में अकेलेपन, मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव की समस्याएँ तेजी से बढ़ रही हैं। तकनीक ने लोगों को जोड़ने का दावा किया है, लेकिन वास्तविक जीवन में लोगों के बीच संवाद और आत्मीयता कम होती दिखाई दे रही है। संयुक्त परिवारों का विघटन, रिश्तों में बढ़ती दूरी और सामाजिक मूल्यों का क्षरण कहीं न कहीं इसी बदलती जीवनशैली का परिणाम है।

यह लेख किसी के करियर या स्वतंत्रता के विरोध में नहीं है। महिलाओं और पुरुषों दोनों का शिक्षित, आत्मनिर्भर और सफल होना समाज के लिए आवश्यक है। किंतु सफलता का अर्थ केवल आर्थिक उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि संतुलित और सुखी जीवन भी है। यदि करियर और पारिवारिक जीवन के बीच संतुलन स्थापित नहीं किया गया, तो भविष्य में समाज को सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

अभिभावकों, शिक्षाविदों, सामाजिक संगठनों और नीति-निर्माताओं को इस विषय पर गंभीर संवाद प्रारंभ करना चाहिए। युवाओं को यह समझाने की आवश्यकता है कि शिक्षा, रोजगार, पदोन्नति और व्यवसाय जितने महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण समय पर पारिवारिक जिम्मेदारियों का निर्वहन, सामाजिक संबंधों का संरक्षण और भावनात्मक संतुलन भी है।

एक स्वस्थ समाज केवल आर्थिक विकास से नहीं बनता, बल्कि मजबूत परिवारों, सुदृढ़ रिश्तों और मानवीय संवेदनाओं से निर्मित होता है। इसलिए आवश्यक है कि हम अपने बच्चों और युवाओं को यह संदेश दें कि जीवन की दौड़ में आगे बढ़िए, सफलता प्राप्त कीजिए, लेकिन उन रिश्तों को पीछे मत छोड़िए जो जीवन को वास्तव में सार्थक बनाते हैं।

प्रगति वही है जो व्यक्ति को आर्थिक रूप से समृद्ध, सामाजिक रूप से उत्तरदायी और पारिवारिक रूप से सम्पन्न बनाए।

(लेखक सामाजिक एवं कर्मचारी हितों से जुड़े विषयों पर अपने विचार व्यक्त करते हैं।)

 

 

 

 

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