Breaking News

बरेली: उर्स-ए-रज़वी से पेश आई अनूठी मिसाल: 108 साल के इतिहास में पहली बार लंगरों में परोसा गया पूरी तरह शाकाहारी भोजन।

उर्स-ए-रज़वी से पेश आई अनूठी मिसाल: 108 साल के इतिहास में पहली बार लंगरों में परोसा गया पूरी तरह शाकाहारी भोजन।

संवाददाता, मोहम्मद वसीम

बरेली। सूफी परंपरा और सामाजिक सौहार्द की अद्भुत मिसाल पेश करते हुए इस बार 108वें उर्स-ए-रज़वी में एक बेहद सराहनीय और ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। आला हजरत इमाम अहमद रज़ा खां फाज़िले बरेलवी की याद में आयोजित होने वाले इस पारंपरिक उर्स के 108 वर्षों के इतिहास में यह पहला अवसर है, जब लंगरों में पूरी तरह से शाकाहारी भोजन का प्रबंध किया गया है।

पारंपरिक मांसाहारी व्यंजनों की जगह इस बार उर्स में शामिल होने वाले श्रद्धालुओं को मटर, पनीर, आलू की बिरयानी, दाल और रोटी जैसे लजीज शाकाहारी व्यंजन परोसे जा रहे हैं। उर्स प्रबंधन के मुताबिक, यह अहम फैसला सावन माह और पवित्र कांवड़ यात्रा के दौरान अन्य समुदायों की धार्मिक भावनाओं और संवेदनाओं का सम्मान करने के उद्देश्य से लिया गया है। आयोजकों का मानना है कि इस पहल से देश भर में आपसी सम्मान, सह-अस्तित्व और साझी गंगा-जमुनी तहजीब का एक मजबूत संदेश गया है। दरगाह परिसर और इस्लामिया मैदान में चल रहे इन लंगरों में बड़ी संख्या में पहुंच रहे श्रद्धालु इस बदलाव का स्वागत कर रहे हैं।

उर्स के पदाधिकारियों का कहना है कि आला हजरत की शिक्षाओं का मुख्य आधार अमन, भाईचारा और मानवता रहा है। उनकी सीख यही है कि धार्मिक आयोजनों की असली खूबसूरती समाज को एक सूत्र में पिरोने वाले व्यवहार में झलकती है। इसी सोच के तहत इस वर्ष की व्यवस्थाओं को रूप दिया गया है।

कार्यक्रम के दौरान वक्ताओं ने आला हजरत के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़े अनछुए पहलुओं को भी साझा किया। उन्होंने बताया कि ब्रिटिश हुकूमत के प्रति उनका विरोध सिर्फ विचारों तक सीमित नहीं था, बल्कि वे अपने व्यवहार से भी उसका प्रतिकार करते थे; जैसे डाक टिकट पर छपी महारानी विक्टोरिया की तस्वीर को उल्टा लगाना उनके उसी अनोखे प्रतिरोध का हिस्सा था।

जिलाधिकारी अविनाश सिंह ने उर्स की व्यवस्थाओं का जायजा लेते हुए कहा कि प्रशासन और स्थानीय समाज के आपसी सहयोग से यह पूरा आयोजन शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हो रहा है। वहीं, मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने इसे धार्मिक मर्यादा का पालन करते हुए सामाजिक सौहार्द को बढ़ावा देने वाला एक बेहतरीन कदम करार दिया है।

मौजूदा समय में जब धार्मिक आयोजनों के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों को लेकर तमाम चर्चाएं होती हैं, तब बरेली से उठी यह पहल यह साबित करती है कि परंपरा और संवेदनशीलता को तालमेल के साथ आगे बढ़ाया जा सकता है।

बाइट : अविनाश सिंह, जिला अधिकारी, बरेली 

बाइट : मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी

 

Spread the love

Check Also

बदायूं: राजकीय मेडिकल कॉलेज में नशा मुक्त भारत पखवाड़ा के तहत हुआ नुक्कड़ नाटक और शपथ ग्रहण कार्यक्रम।

बदायूं: राजकीय मेडिकल कॉलेज में नशा मुक्त भारत पखवाड़ा के तहत हुआ नुक्कड़ नाटक और …