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सहसवान तहसील में राजस्व परिषद के सख्त आदेशों की धज्जियां! ‘सुविधा शुल्क’ के बिना फाइलें न सरकने का आरोप, निजी कारिंदों के भरोसे सरकारी गोपनीयता।

सहसवान तहसील में राजस्व परिषद के सख्त आदेशों की धज्जियां! ‘सुविधा शुल्क’ के बिना फाइलें न सरकने का आरोप, निजी कारिंदों के भरोसे सरकारी गोपनीयता।

सहसवान (बदायूं)। सूबे की योगी सरकार जहाँ एक तरफ जीरो टॉलरेंस नीति के तहत प्रदेश को पूरी तरह भ्रष्टाचार मुक्त बनाने के दावे कर रही है, वहीं दूसरी ओर जनपद बदायूं की सहसवान तहसील में जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। तहसील में अपने काम के लिए भटक रहे फरियादियों का सीधा आरोप है कि यहाँ कोई भी छोटा-बड़ा काम बिना ‘सुविधा शुल्क’ यानी नजराने के आगे नहीं बढ़ता। वर्तमान में सहसवान तहसील पूरी तरह से लेखपालों और कानूनगो के कथित सिंडिकेट के चंगुल में फंसी दिखाई दे रही है, जहाँ जनता को सरेआम परेशान किया जा रहा है।

फरियादियों का कहना है कि आय, जाति, सामान्य निवास प्रमाण पत्र से लेकर विरासत, अंश संशोधन, नाम संशोधन और हैसियत प्रमाण पत्र जैसी जरूरी कागजी रिपोर्ट लगवाने के लिए उन्हें दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते हैं। हद तो तब हो जाती है जब कोई पीड़ित अपनी जायज जमीन की पैमाइश कराने की गुहार लगाता है, लेकिन वहां भी बिना ‘विशेष सुविधा’ के फाइल को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है। इस पूरी व्यवस्था में लेखपालों और कानूनगो की आपसी मिलीभगत के चलते आम जनता बुरी तरह पिस रही है।

इस पूरे मामले का सबसे गंभीर और चौंकाने वाला पहलू यह है कि शासनादेशों को ताक पर रखकर यहाँ धड़ल्ले से निजी कर्मचारियों (प्राइवेट कारिंदों) का इस्तेमाल किया जा रहा है। गौरतलब है कि इस संबंध में राजस्व परिषद, उत्तर प्रदेश, लखनऊ के अनुभाग-12 द्वारा जारी अत्यंत महत्वपूर्ण पत्र संख्या 3163/12-एल(4)/2023 के तहत सूबे के सभी मण्डलायुक्तों और जिलाधिकारियों को कड़े निर्देश दिए गए हैं। इस शासनादेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख है कि मण्डल, कलेक्ट्रेट या तहसील कार्यालयों में बाहरी व्यक्तियों या निजी कार्मिकों से किसी भी दशा में शासकीय या विभागीय कार्य न कराया जाए, क्योंकि ऐसे व्यक्तियों द्वारा भ्रष्टाचार व अनियमितताएं किए जाने की शिकायतें निरंतर प्राप्त हो रही हैं। आदेश में यह भी चेतावनी दी गई है कि ऐसी शिकायत संज्ञान में आने पर संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।

इसके बावजूद सहसवान तहसील में इस सरकारी आदेश को सरेआम ठेंगा दिखाते हुए एक-एक लेखपाल के नीचे कई-कई गैर-सरकारी युवक सरकारी कुर्सियां संभाले बैठे हैं। इन प्राइवेट कर्मियों के हाथों में सरकारी बस्ते और संवेदनशील दस्तावेज सौंप दिए जाते हैं, जिससे शासकीय अभिलेखों की गोपनीयता सीधे तौर पर भंग हो रही है। अब क्षेत्र के जागरूक नागरिकों के बीच यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न बनकर उभरा है कि इन प्राइवेट कर्मचारियों को दी जाने वाली तनख्वाह का जरिया क्या है? क्या ये कर्मचारी इन्हें अपने वेतन से भुगतान करते हैं या फिर जनता से होने वाली कथित अवैध उगाही के पैसों से इन कारिंदों को पाला जा रहा है।

फरियादियों का साफ आरोप है कि जो व्यक्ति सुविधा शुल्क देने में असमर्थता जताता है, उसकी फाइल में कोई न कोई तकनीकी कमी निकालकर उसे महीनों अटकाया या निरस्त कर दिया जाता है। शासन के कड़े नियमों के बावजूद सहसवान तहसील में सरेआम चल रही इस मनमानी को लेकर स्थानीय जनता में भारी आक्रोश है और लोग अब उच्चाधिकारियों से इस पूरे भ्रष्ट तंत्र पर नकेल कसने की मांग कर रहे हैं।

 

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