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बरेली: स्कूली वाहनों में सुरक्षा नियमों की अनदेखी, बच्चों की जान पर मंडरा रहा खतरा।

बरेली: स्कूली वाहनों में सुरक्षा नियमों की अनदेखी, बच्चों की जान पर मंडरा रहा खतरा।

नौनिहालों की जान से खिलवाड़: स्कूली बसें बनीं ‘चलता-फिरता मौत का खतरा’, क्षमता से अधिक बच्चों को ढो रहे वाहन।

नियम ताक पर, जिम्मेदार बेखबर; हादसे से पहले जागेगा प्रशासन या फिर किसी बड़ी त्रासदी का होगा इंतजार?

संवाददाता, मोहम्मद वसीम 

बरेली। जिले की तहसील बहेड़ी क्षेत्र में संचालित कई निजी विद्यालयों की स्कूली बसें इन दिनों बच्चों के लिए सुरक्षित परिवहन का जरिया नहीं, बल्कि ‘चलता-फिरता खतरा’ बनती जा रही हैं। वाहनों में क्षमता से कहीं अधिक बच्चों को ठूंस-ठूंसकर बैठाया जा रहा है। कई वाहनों की स्थिति यह है कि सीटें पूरी तरह भर जाने के बाद भी मासूम बच्चे गलियारे में खड़े होकर सफर करने को मजबूर हैं। इसके बावजूद संबंधित विभागों की चुप्पी और स्कूल प्रबंधनों की लापरवाही लगातार बनी हुई है।

सुबह स्कूल खुलने और दोपहर में छुट्टी के समय सड़कों पर दौड़ती इन बसों का नजारा यातायात और सुरक्षा व्यवस्था की पोल खोल देता है। कई बसों में बच्चों की संख्या निर्धारित क्षमता से दोगुना तक दिखाई देती है। ऐसे में यदि अचानक ब्रेक लगाने की जरूरत पड़ जाए, वाहन अनियंत्रित हो जाए या कोई सड़क हादसा हो जाए, तो सबसे बड़ा खामियाजा इन मासूम बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर भुगतना पड़ सकता है।

स्कूली वाहनों का संचालन बच्चों की सुरक्षा को सर्वोपरि रखकर तय मानकों के तहत ही होना चाहिए। लेकिन धरातल पर हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आती है। वाहन में क्षमता से अधिक बच्चों को बैठाना न केवल मोटर वाहन अधिनियम का गंभीर उल्लंघन है, बल्कि यह सीधे-सीधे नौनिहालों की जिंदगी के साथ खुला खिलवाड़ है।

स्थानीय नागरिकों का कहना है कि इस गंभीर समस्या की शिकायत कई बार संबंधित अधिकारियों से की जा चुकी है, लेकिन कार्रवाई के नाम पर केवल कागजी खानापूर्ति ही होती रही है। नियमित जांच और सख्त कानूनी कार्रवाई के अभाव में स्कूल संचालकों के हौसले इतने बुलंद हो चुके हैं कि नियमों की धज्जियां उड़ाना उनके लिए आम बात बन गई है।

इस पूरे मामले का एक चिंताजनक पहलू यह भी है कि अधिकांश अभिभावक अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर खुलकर आवाज उठाने से कतरा रहे हैं। मजबूरी हो या उदासीनता, उनकी यह खामोशी भी अप्रत्यक्ष रूप से इस लापरवाह रवैये को बढ़ावा दे रही है।

सवाल यह उठता है कि क्या प्रशासन किसी बड़े और वीभत्स हादसे के बाद ही नींद से जागेगा और आखिर मासूम बच्चों की जान की कीमत पर नियमों से समझौता कब तक चलता रहेगा? क्षेत्रीय जनता और जागरूक नागरिकों ने जिला प्रशासन तथा परिवहन विभाग से पुरजोर मांग की है कि जिलेभर में स्कूली वाहनों की जांच के लिए विशेष अभियान चलाया जाए। क्षमता से अधिक बच्चों को ढोने वाले और सुरक्षा मानकों को ताक पर रखने वाले स्कूलों के विरुद्ध कठोर दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि किसी भी अनहोनी से पहले परिवहन व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सके।

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