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2027 के चुनाव में सहसवान का सियासी संग्राम, सपा के सामने गढ़ बचाने की चुनौती।

मुलायम सिंह यादव से लेकर बृजेश यादव तक सपा का रहा दबदबा, भाजपा की नजर पहली जीत पर; जातीय समीकरणों के साथ विकास के मुद्दे भी निभाएंगे अहम भूमिका।

प्रधान संपादक, रवि कुमार शाक्य 

सहसवान (बदायूं)। बदायूं जिले की सहसवान विधानसभा सीट को समाजवादी पार्टी के मजबूत राजनीतिक गढ़ के रूप में जाना जाता है। इस सीट से सपा संस्थापक एवं पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव भी विधायक रह चुके हैं। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी ने जीत दर्ज कर अपना कब्जा बरकरार रखा था। अब वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां तेज होने लगी हैं। ऐसे में सहसवान की सियासत में एक बार फिर मुकाबले को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। बड़ा सवाल यह है कि क्या समाजवादी पार्टी अपना पुराना गढ़ बचा पाएगी या भाजपा समेत अन्य दल यहां नए राजनीतिक समीकरण बनाने में सफल होंगे?

मुलायम सिंह यादव से शुरू हुई सपा की मजबूत राजनीतिक पहचान।

सहसवान विधानसभा सीट का गठन वर्ष 1957 में हुआ था। पहले विधानसभा चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशी उल्फत सिंह ने जीत दर्ज की थी। इसके बाद अलग-अलग चुनावों में विभिन्न राजनीतिक दलों का प्रभाव रहा, लेकिन 1990 के दशक के बाद समाजवादी पार्टी का जनाधार यहां लगातार मजबूत होता गया।

वर्ष 1991 में ओमकार सिंह यादव, 1993 में मीर मजहर अली उर्फ नन्हे मियां और 1996 में सपा के टिकट पर मुलायम सिंह यादव ने जीत दर्ज की। मुलायम सिंह यादव की जीत के बाद सहसवान की पहचान समाजवादी पार्टी के मजबूत गढ़ के रूप में स्थापित हुई।

वर्ष 2002 में ओमकार सिंह यादव ने सपा के टिकट पर फिर जीत हासिल की। 2007 का विधानसभा चुनाव काफी करीबी रहा, जिसमें राष्ट्रीय परिवर्तन दल के डीपी यादव ने ओमकार सिंह यादव को मामूली अंतर से शिकस्त दी। इसके बाद 2012 और 2017 के विधानसभा चुनावों में ओमकार सिंह यादव ने लगातार जीत दर्ज कर सपा की वापसी कराई।

ओमकार सिंह यादव पांच बार विधायक रहे और अखिलेश यादव सरकार में मंत्री भी बने। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने अपने पुत्र बृजेश यादव को राजनीतिक विरासत सौंपी। सपा प्रत्याशी बृजेश यादव ने जीत दर्ज कर पार्टी का कब्जा बरकरार रखा।

भाजपा के सामने पहली जीत दर्ज करने की चुनौती।

सहसवान विधानसभा सीट पर भाजपा अभी तक विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज नहीं कर सकी है। ऐसे में 2027 का चुनाव पार्टी के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है। भाजपा की कोशिश सपा के मजबूत राजनीतिक आधार में सेंध लगाने और यहां पहली बार जीत हासिल करने की होगी। वहीं समाजवादी पार्टी के सामने अपनी परंपरागत राजनीतिक पकड़ और सीट को बचाए रखने की चुनौती रहेगी।

बहुजन समाज पार्टी भी सहसवान के चुनावी मुकाबलों में कई बार महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुकी है। ऐसे में 2027 के चुनाव में बसपा का प्रदर्शन और अन्य दलों की भूमिका भी मुकाबले के समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

जातीय समीकरणों पर भी रहेगी राजनीतिक दलों की नजर।

सहसवान विधानसभा का चुनावी गणित जातीय और सामाजिक समीकरणों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। अनुमानित आंकड़ों के अनुसार विधानसभा क्षेत्र में करीब 4.25 लाख मतदाता हैं। इनमें लगभग 1.10 लाख मुस्लिम, 1.30 लाख यादव, 55 हजार दलित, 22 हजार कश्यप, 11 हजार मौर्य, 5 हजार ब्राह्मण और करीब 4 हजार ठाकुर मतदाता माने जाते हैं।

इसके अलावा शाक्य, वैश्य, पाल, लोधी, सैनी, गुर्जर और अन्य समुदायों के मतदाता भी चुनाव में अहम भूमिका निभा सकते हैं। हालांकि ये आंकड़े अनुमानित हैं, आधिकारिक जातिवार मतदाता आंकड़े नहीं हैं। ऐसे में सभी समुदायों का रुख, स्थानीय मुद्दे और मतदान प्रतिशत चुनावी नतीजों को प्रभावित कर सकते हैं।

सपा के परंपरागत समर्थन आधार में यादव और मुस्लिम मतदाताओं की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है। वहीं भाजपा की रणनीति गैर-यादव ओबीसी, अनुसूचित जाति और सवर्ण मतदाताओं के बीच अपना समर्थन बढ़ाने पर केंद्रित रह सकती है। हालांकि वास्तविक चुनावी तस्वीर उम्मीदवारों और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।

विकास, रोजगार और बुनियादी सुविधाएं भी बनेंगी चुनावी मुद्दे।

सहसवान की सियासत में जातीय समीकरणों के साथ विकास के मुद्दे भी महत्वपूर्ण रहेंगे। ग्रामीण क्षेत्रों में सड़क, जलभराव, बिजली आपूर्ति और स्वच्छ पेयजल जैसी समस्याएं लोगों के लिए चिंता का विषय हैं। युवाओं के बीच रोजगार का सवाल प्रमुख रहेगा, जबकि किसानों के लिए फसल का उचित मूल्य, खाद-बीज की उपलब्धता और कृषि कार्यों के लिए बिजली जैसे मुद्दे अहम हो सकते हैं।

इसके अलावा स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा व्यवस्था और क्षेत्र में विकास कार्यों की स्थिति भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित कर सकती है। चुनाव के दौरान राजनीतिक दलों को इन स्थानीय समस्याओं और जनता की अपेक्षाओं पर अपनी बात रखनी होगी।

सपा की विरासत बनाम भाजपा की चुनावी कोशिश।

वर्ष 2027 का विधानसभा चुनाव सहसवान की राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण रहने वाला है। एक तरफ समाजवादी पार्टी के पास पुराना संगठन, राजनीतिक विरासत और परंपरागत समर्थन आधार है, तो दूसरी तरफ भाजपा लगातार अपना जनाधार बढ़ाने की कोशिश में जुटी है। बसपा और अन्य दलों की भूमिका भी चुनावी मुकाबले को प्रभावित कर सकती है।

फिलहाल चुनाव में काफी समय बाकी है। ऐसे में उम्मीदवारों की घोषणा, राजनीतिक गठबंधन, स्थानीय मुद्दे और चुनाव के दौरान बनने वाले नए समीकरण ही मुकाबले की दिशा तय करेंगे। अब देखना होगा कि 2027 में सहसवान की सियासत में बदलाव देखने को मिलता है या समाजवादी पार्टी एक बार फिर अपने पुराने राजनीतिक गढ़ में जीत दर्ज कर पाती है।

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